लिपी विकास के तीन चरण
लिपि - विकास के तीन चरण हैं... पहला चित्र लिपि, दूसरा भाव लिपि और तीसरा ध्वन्यात्मक लिपि।
आँख का चित्र बना दिए तो वह चित्र लिपि है....आँख में बहते आँसू भी उकेर दिए तो वह भाव लिपि है।
मगर जब आप " आँख " में शामिल ध्वनियों को लिखकर लिपिबद्ध कर दिए, तब वह ध्वन्यात्मक लिपि है।
चित्र लिपि को आप पढ़ कर बोल नहीं सकते हैं, वह तो आँख का चित्र है, उसे आप कैसे बोलिएगा? मगर उसे भी लिपि कहा जाता है।
आखिरी चरण की लिपि ध्वन्यात्मक लिपि है, एकदम से विकसित ...आश्चर्य होता है कि सम्राट अशोक ने सवा दो हजार साल पहले इतनी विकसित लिपि का प्रयोग अपने शिलालेखों में किया है....जिसके आगे आज भी देश नहीं जा सका है।
मगर भारत में सब धान बाईस पसेरी...अशोक ने कहा कि यह धम्म लिपि है तो विद्वानों ने कहा - नहीं, ब्राह्मी लिपि है।
अजीब देश है कि लिखने वाला कह रहा है कि धम्म लिपि है....मगर जो नहीं लिखने वाला है,वहीं जबरदस्ती कह रहा है कि यह ब्राह्मी लिपि है।
इसी बिंदु पर एक बैठे - बैठे व्याख्यान!
डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंग
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