वामन शिवराम आप्टे का संस्कृत- हिंदी कोश

वामन शिवराम आप्टे का संस्कृत- हिंदी कोश पलट रहा हूँ ....

श्रमण का पहला अर्थ परिश्रमी और दूसरा अर्थ कमीना दिया हुआ है....

श्रमणी का एक अर्थ भिक्षुणी और दूसरा अर्थ नीच जाति की स्त्री दिया हुआ है....

एक ही शब्द के अर्थ में आकाश - पाताल का अंतर, विशेषकर ऐसे संदर्भ में दो धाराओं के सांस्कृतिक संघर्ष के कारण होता है.....


पोस्ट में काट - पीट की कोई गुंजाइश नहीं है। डिक्शनरी पलटिए और देख लीजिए।

जागो बहुजनों अब तो जागो कोई जगाने आया हैं।।क्या है बुरा क्या है अच्छा कोई बताने आया है।।शब्दो की जादूगरी से बदला इतिहास बुद्ध की भासा सीखा ने आया है।।तुम्ही से भारत विश्वगुरु बना कोई याद दिलाने आया है।।।मक्कारों का खेल निराला झूठों  से बचाने आया है।।कितनी सदियाँ बीती हैं बिरह की नया सूरज उग आया हैं।।।देख बहुजन उठ बहुजन नया सवेरा लाया हैं।।।

ये बातें बहुत साफ हैं। आप जैसे लोगों ने इतने परिश्रम और मिशनरी भाव से इन्हें खोजा और बताया है। 
अद्भुत यह है कि इसके बावजूद 'वे',  'हमें' बरगलाने में कामयाब हैं...

यही नही ,रांड का अर्थ भी देखिये, विधवा और वैश्या दोनो दिया है... 

संस्कृतवादियो की नीचता देखिये.... विधवा को वैश्या बना दिया

इन्होंने कोई मौका नहीं छोड़ा श्रमण संस्कृति को बदनाम करने का...

इन्होंने सीधे को उल्टा कर दिया था लेकिन बहुत से बहुजन बुद्धिजीवी अब उल्टे को सीधा कर रहे हैं।।

जैसे अमेरिका जैसे देशों में कम्युनिस्ट एक गाली की तरह इस्तेमाल होता है, जबकि कम्युनिज्म मज़दूर वर्ग की सत्ता बोधक है।

शंकराचार्य तत्वों का, ब्राह्मणवादीयों का धरमनाम मैला मगज जाने।
सिद्ध बुद्ध सूं साजिश, लोक-परलोक आस कालांध वैदिकधंधा जाने।।
इसका अर्थ यही हुआ कि जो बौद्धिष्ट थे वह इनकी दृष्टि में इनके साहित्य और इतिहास में नीच और शूद्र हुए,

वामन आप्टे ने ईमानदारी के साथ "ब्राहमण समाज प्रदत्त" निंदक रूपांतर भी दिया है । यह शब्दकोश जरूरी स्रोत ग्रंथ है ।
स्पष्ट है कि 'श्रमण' व 'श्रमणी' शब्द के ये दोनों विपरीतार्थी/विरोधाभाषी अर्थ जनेऊधारी लोगों ने ठीक वैसे ही किये है, जैसे 'बुद्ध' का 'बुद्धिमान' और 'बुद्धू' किया है।

सनातन व भगवान का सच
— झूठ का पर्दा हटाते हुए 
~~~~~~~~~~~~~~
सनातन व भगवान यह शब्द वेदों में सिर्फ अथर्ववेद में आये हैं, जो आखिरी वेद है; बाकी वेदों में नहीं। (ऋग्वेद पहला कहा जाता है।)
साफ है कि, भगवान व सनातन यह मौलिक शब्द बुद्ध ने व्याख्यायित कर इस्तेमाल किये है। जो आगे वैदिकों ने बुद्ध से उठाये, हाइजैक किये, और अपने गलत मतलब से इस्तेमाल किये जा रहे हैं।
इतना ही नहीं, आत्मा परमात्मा को सीधे नकारने वाले भगवान बुद्ध को महात्मा बुद्ध कहने की कुटिलता भी यह करते हैं, और अपने मनोकल्पित विष्णु, शंकर, राम आदि को भगवान कहते हैं, महात्मा नहीं।

ऐसे ही गोरखनाथ बंध, मुद्रा, कुंभकादि तथाकथित योग प्रॅक्टिसेस के जनक है, पायनियर है, परंतु गोरख इन्हें योग या हठयोग नहीं कहते। गोरख योग की व्याख्या "जोग अलख विणांनं। (योग अलख विग्यान।)" व "जोगी अलख विणांनीं। (योगी अलख विग्यानी।)" करते हैं। गोरख अपनी कालजयी देषना "सबदी" में अलख संग्यान सूं बाला ध्यान ग्यान दीप बोधि धरम की बात करते हैं। और ये तत्त गोरख - मछिंद्रादि सिद्धों के नाम पर झूठमूठ नवनाथ भक्तिसार, सिद्ध सिद्धांत पद्धति, कुलार्णव तंत्र, कौलज्ञाननिर्णय, शाबरी-काबरी मंत्र-तंत्र, गोबर से पैदाइश आदि प्रचार चलाते हैं।

आगे देखे कि, लोक-परलोक आस कालांध वैदिकधंधा परंपरा कब व कैसे सनातन धर्म हो गयी? और अब हिंदू धर्म? कितना झूठ का पुलिंदा धरम के नाम पर! भ्रमित होना कुदरत को मंजूर नहीं।

"... एस धम्मो सनंतनो।" — बुद्ध।
"भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो अनासवो,
 भग्गस्स पापका धम्मा भगवा तेन उच्चति।" 
— बुद्ध। भग्ग > भगवा > इति भगवान बुद्ध।

" अधिक तत्त ते गुरू बोलिये, हीन तत ते चेला।
मन मांनै तौ संगि रमौ, नहीं तौ रमौ अकेला।।"
— गोरख।

सनातन/सनंतन = सार्वजनीन, सेक्युलर, सार्वभौम, eternal, universal laws of nature by itself. 
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