मीनाण्डर यवन थे ....विदेशी थे ....लेकिन धम्म की राह चुनी थी। बुतकारा स्तूप की पहली लेयर अशोक की बनवाई हुई है तो दूसरी मीनाण्डर की बनवाई हुई है।

मीनाण्डर यवन थे ....विदेशी थे ....लेकिन धम्म की राह चुनी थी। बुतकारा स्तूप की पहली लेयर अशोक की बनवाई हुई है तो दूसरी मीनाण्डर की बनवाई हुई है।

बड़े दार्शनिक थे...इंडो - ग्रीक इतिहास में दूजा नहीं हुआ। 

सो बड़े न्यायप्रिय थे ....न्यायप्रियता ने इन्हें जनता में बड़ी शोहरत दिलाई थी।

एक दिन एक शिविर में अचानक इनकी मृत्यु ( 147 ई. पू.) हुई।

प्लूटार्क ने लिखा है कि मीनाण्डर के भस्म को लेकर जनता में झगड़े उठ खड़े हुए ....क्योंकि वे इतना जनप्रिय थे कि लोग उनके भस्म पर अलग - अलग स्तूप बनाना चाहते थे।

भारत के इतिहास में बुद्ध के बाद मीनाण्डर, मीनाण्डर के बाद कबीर और कबीर के बाद नानक का नाम आता है, जिनके मृत शरीर को भी अपनाने के लिए जनता व्याकुल थी।

सर, भारत-युनान इतिहास लिखने के बजाय हिंद-युनानी इतिहास क्यु लिखा है, कृपया थोडा स्पष्ट करे.

Chandrashekhar Urade इंडो - ग्रीक कर दिए हैं, इसे बुद्धिस्ट- ग्रीक भी किया जा सकता है। अभी सब समझने लिए ऐसा लिखना होता है।
Rajendra Prasad Singh धन्यवाद सर, अन्यथा कोई यह कह सकता था की, ' हिंदु  संस्कृती यह ग्रिक जैसा ही प्राचीन है '

मिलिंदपनहो पुस्तक में बौद्ध भिक्खु नागसेन और मिनांडर का वार्तालाप है । 
बहुत ही अच्छी जानकारी है सर


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