आधुनिक काल में अंग्रेज अशोक के शिलालेखों के पढ़ने को लेकर पसोपेश में थे....
आधुनिक काल में अंग्रेज अशोक के शिलालेखों के पढ़ने को लेकर पसोपेश में थे....
आखिरकार विलियम जोन्स ने बनारस के तत्कालीन हाकिम के पास अशोक की लिपियों की छाप भेजी कि आप इसे बनारस के किसी विद्वान पंडित से पढ़वाइए.....
बनारस विद्वान पंडितों का शहर है।
बनारस के एक विद्वान पंडित ने इसे पढ़कर बताए कि इस पर युधिष्ठिर का गुप्त बनवास लिखा है.....
उस विद्वान पंडित ने अशोक की लिपि को पढ़ने की एक जाली किताब भी लिख डाली और बताए कि मैंने सही पढ़ा है।
बहुत दिनों तक उस विद्वान पंडित की बात सत्य मानकर लोग भ्रम में जीते रहे।
( साभार: प्राचीन पोथियाँ, हजारीप्रसाद द्विवेदी )
सम्राट अशोक का सही इतिहास का मराठी अनुवाद लहू कांबळे ने किया है...
लहू कांबले ने पाँच विषयों में M.A. किए हैं। इनका हस्तलेखन बेमिसाल है। कभी फेसबुक पर डालेंगे।
लहू कांबले को धन्यवाद और शुभकामनाएँ!
अनुवादक लहू कांबले का हस्तलेखन कितना सुंदर है! ऐसा ही कथाकार कमलेश्वर लिखते थे।
किंडल पर यह ई - बुक के रूप में उपलब्ध है। कागज पर आने का इंतजार कीजिए।
Rajendra Prasad Singh कृतज्ञता ज्ञापन भी बड़ी शालीनता से और कहीं से भी नहीं लगा कि ये किसी मरहठी का लिखा गया पत्र है. हम हिंदी भाषी लोग प्राय: अंग्रेज़ी या अन्य भाषा के शब्द उस दशा में भी प्रयोग कर दिया करते हैं जहां वे आवश्यक नहीं होते. आप सहित आपके शिष्य को बहुत बहुत साधुवाद!
शायद मुगल सम्राट अकबर ने भी किसी विद्वान ब्राह्मण से अशोक के अभिलेखों का अनुवाद करवाने का प्रयास किया था।
सातवाहन राजे के पहले प्रमुख राजा का सिक्का जिस पर उसका नाम लिखा है 230-207 ईसा पूर्व
ऐसा तब भी हुआ था जब फिरोज़ तुगलक़ शिकार करने के लिए हरियाणा के यमुनानगर जिले में स्थित टोपरा कलां के जंगल में गया हुआ था. वहां उसने अशोक स्तम्भ देखा जिस पर धम्म लिपि में लेख लिखा हुआ था. उसने अपने सल्तनत के संस्कृत के मूर्धन्य विद्वानों को उसे पढ़कर उसका अर्थ बताने का आदेश दिया. ब्राह्मण विद्वान उसे देखा तो दंग रह गए कि उन्हें उस लिपि का तो ज्ञान ही नहीं है - क्या पढ़े और क्या बताएं. और यदि बादशाह को सच बता दिया; सही बोल दिया कि यह भाषा हमें पढ़ने नहीं आती है तो हमारी विद्वत्ता का जनता में उपहास होगा; हमारी बदनामी होगी और यदि हमारा जवाब बादशाह को नागवार लगा तो मृत्यु दंड भी दे सकता है.
अपने यहां एक कहावत है - "खर खर खराय त बाभन पराय." इसका मतलब यह होता है कि ब्राह्मण इतना डरपोक होता है कि खर पतवार में जब थोड़ी सी भी खर खराहट की आवाज़ या हलचल होती है तो उसका कारण वहां पर जंगली जानवर या सांप आदि के होने का अंदेशा मानकर ब्राह्मण वहां से भाग खड़ा होता है.
अतः ब्राह्मणों ने अपनी सुरक्षा के मद्दे नज़र यह बताया कि स्तंभ पर प्राचीन ब्राह्मण लिपि (ब्राह्मी लिपि) में लिखा है कि यदि बादशाह उसे अपने महल में स्थापित करेगा तो बादशाह के यश और समृद्धि में वृद्धि होगी. फिरोज़ शाह तुगलक़ ने उस स्तंभ लेख को ब्रह्मलेख मानकर उसका सम्मान करते हुए उस स्तंभ को वहां खुदवाकर उसे बड़ी सावधानी से ४२ बैलगाड़ियों में रुई के गट्ठर बिछाकर लदवाया. और २०० विशेष शक्तिशाली लोगों की मदद से बड़े सम्मान के साथ दिल्ली ले आया. अपने महल में उस जगह पर स्थापित करवाया जहां पर वर्तमान में फिरोज़ शाह कोटला विद्यमान है. वैसा करके बादशाह के यश और समृद्धि में कितनी वृद्धि हुई इसे इतिहास के विद्वान ही बता सकते हैं?
किन्तु वास्तविकता यह है कि वह स्तंभ संरक्षण के अभाव में अपनी दुर्दशा का शिकार हो गया है; उसमें क्षरण हो रहा है; उसके पालिश की चमक धूमिल हो चुकी है व उसकी लिखावट मिटने लगी है. पुरातत्व विभाग सजग नहीं है. उसे सम्राट अशोक के स्तंभ में भारत का प्राचीन गौरव नज़र नहीं आता. सच है कि जितना ब्राह्मणवाद का शिकार उस समय वह स्तंभ नहीं हुआ था उससे अधिक अब हो रहा है.
जिसको न निज गौरव न निज राष्ट्र का अभिमान है.
वह नर नहीं बल्कि मृत पशु के समान है.
यदि मुगल शासक अशोक के सारे स्तम्भ को पढ़ लेते तो शायद नालन्दा कभी जलाई नही जाती थी
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