सिंधु घाटी सभ्यता की एक मूर्ति को " प्रीस्ट किंग " कहा गया है।
सिंधु घाटी सभ्यता की एक मूर्ति को " प्रीस्ट किंग " कहा गया है। उजले रंग की कम पकी हुई और सेलखड़ी की बनी हुई मूर्ति है। मूर्ति की ऊँचाई 17.5 सेंमी तथा चौड़ाई 11 सेंमी है। फिलहाल मुअनजोदड़ो से प्राप्त यह मूर्ति नेशनल म्यूजियम कराँची में है।
प्रीस्ट किंग की मूर्ति के शरीर पर बौद्ध शैली का वस्त्र है, जिसमें वस्त्र को बाएँ कंधे पर रखा गया है और दायाँ कंधा मुक्त है। गोतम बुद्ध भी इसी शैली में वस्त्र धारण करते थे।
प्रीस्ट किंग की मूर्ति की आँखें आधी खुली हुईं हैं और उसकी नजर नाक के अगले हिस्से पर टिकी हुई है। बुद्ध की भी अमूमन मूर्तियाँ अधखुली आँखों वाली हैं और नजर नाक के अगले हिस्से पर टिकी हुई है।
अधखुली आँखें अनासक्त अवस्था को दर्शाती हैं और इसी अवस्था को दिखाने के लिए बुद्ध की आँखें अधखुली दिखाई जाती है।
प्रीस्ट किंग की मूर्ति की कमर का निचला हिस्सा नहीं है। इस कारण यह हमें पता नहीं है कि वह किस मुद्रा में बैठी हुई है।
मगर मुअनजोदड़ो के एल एरिया से गोतम बुद्ध जैसा वस्त्र पहने और उन्हीं की मुद्रा में बैठी हुई एक दूसरी मूर्ति मिली है। मूर्ति की कमर में चुन्नट वाला गोतम बुद्ध जैसा वस्त्र है।
चुन्नट वाली यह मूर्ति धूसर सेलखड़ी की बनी है और फिलहाल इस्लामाबाद म्यूजियम में है। मूर्ति का दायाँ हाथ भूमि स्पर्श मुद्रा में है।
मगर चुन्नट वाली इस मूर्ति का सिर नहीं है। संयोग से पीठ के ऊपरी हिस्से का केश - विन्यास बच गया है। चुन्नट वाली इस मूर्ति का केश - विन्यास ठीक प्रीस्ट किंग जैसा है। दोनों मूर्तियाँ वैशिष्ट्य में एक जैसी हैं।
अब हम प्रीस्ट किंग के निचले वस्त्र तथा बैठने की मुद्रा की परिकल्पना कर सकते हैं। प्रीस्ट किंग भी कमर में चुन्नट वाला वस्त्र पहना होगा और उसकी बैठने की मुद्रा भूमि स्पर्श मुद्रा होगी।
किंग प्रीस्ट की कमर के नीचे का वस्त्र, कमर के ऊपर का वस्त्र, बैठने की मुद्रा, अधखुली आँखें, नाक के अगले हिस्से पर नजर - सब कुछ बौद्ध संस्कृति से मेल खाते हैं।
प्रीस्ट किंग का अनुवाद पुरोहित राजा किया गया है। लेकिन बौद्ध शैली का पुरोहित होने के कारण बुद्धिस्ट मंक किंग कहना अधिक सटीक होगा।
सिर पर पीपल, सील पर पीपल, बर्तन पर पीपल - सिंधु घाटी सभ्यता में पीपल छाया हुआ था। पीपल की पूजा, पीपल की रक्षा, पीपल लेने की होड़ - सिंधु घाटी सभ्यता में पीपल सर्वाधिक पवित्र था।
28 बुद्धों में से चौथे दीपंकर बुद्ध थे। दीपंकर बुद्ध का बोधिवृक्ष पीपल है। ये जो प्रीस्ट किंग की मूर्ति है, वह लगभग 1900 - 2000 ईसा पूर्व की है। दीपंकर बुद्ध का समय भी लगभग वहीं है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध हुए। दीपंकर बुद्ध उनसे 24 पीढ़ी पहले हुए।
सिंधु घाटी सभ्यता पर पीपल का जबरदस्त प्रभाव दीपंकर बुद्ध के बोधिवृक्ष पीपल के कारण जान पड़ता है।
ऐसा अनुमान किया गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता की प्रशासन - व्यवस्था धर्म गुरूओं और पुरोहितों के हाथों में केंद्रित थी। शासन धर्म प्रधान था, न राज सिंहासन, न राज महल। जनता पर शासन करने वाली हुकूमत जो भी रही हो, वह बलप्रयोग में विश्वास नहीं करती थी। जीवन शांतिपूर्ण था। ऐसे भी अनासक्त मुद्रा का शासन बहुत क्रूर नहीं हो सकता।
सिंधु घाटी सभ्यता में तलवारें बिल्कुल नहीं मिलतीं। शिरस्त्राण और कवच जैसी रक्षात्मक चीजें सिरे से गायब हैं। बड़े पैमाने पर फौज और लश्कर का पता नहीं चलता। जेल जैसी कोई संरचना नहीं मिलती। जो चाकू और कुल्हाड़े मिले हैं, वे हथियार नहीं बल्कि औजार हैं। यहीं तो बौद्ध सभ्यता है।
भारतीय उपमहाद्वीप का असल इतिहास, बुद्धमय ही है। जिसे धूर्तो ने अपने फायदे के लिए तोड़ मरोड़ कर पेश किया। जबतक धम्म का प्रसार रहा, यह सोने की चिड़िया बना रहा। तथ्यों का विज्ञान सम्मत, सम्यक परिशीलन करने,एवं निष्कर्ष निकालकर दुनिया के सामने असली इतिहास लाने हेतु आपको नमन।
एलोरा गुफाओ में जो सात बुध्द (सप्तबुध्द) हे वह भी अलग अलग पेड़ों के निचे बैठे हैं।
इस मूर्ति का केश विन्यास देखिए ,आज की पश्चिमी सभ्यता के लोग अब ऐसा फैशन कर रहे हैं । बालों को बाँधने के लिए Ribbon का इस्तेमाल किया गया है ।
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