था अशोक स्तंभ और बताया गया भीम की लाठी तो पहचानाता कैसे?

जाना था पूरब और जा रहे थे पश्चिम तो रिजल्ट आता कैसे?

था अशोक स्तंभ और बताया गया भीम की लाठी तो पहचानाता कैसे?

था अशोक का इतिहास और बताया गया महाभारत का वृत्तांत तो विषय पकड़ाता कैसे?

लिखा था प्राकृत में और पढ़ा जा रहा था संस्कृत में तो पढ़ाता कैसे?

इसीलिए अशोक के शिलालेखों को पढ़ने में देर हुई।

इतिहास के झूठे ठिकानों पर छापा मारती किंडल पर आ गई पुस्तक - " प्राचीन भारत का बौद्ध इतिहास "।

छापामारी में अनेक नकली और मिलावटी तथ्य बरामद हुए हैं।

सच तो ये है कि महाभारत जैसी कोई घटना हुई नहीं बल्कि कलमकसाईयों ने मौर्यों कि गाथा को महाभारत और रामायण जैसी काल्पनिक कहानी बनाकर लोगों का मनोरंजन किया और इतिहास दफन होते चला गया। शुक्र है चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान की और उनकी दूरदर्शिता की जो आज इतिहास जमीन का सीना चीर कर बाहर निकल रहा है। 
#जय_मौर्य ❗  #जय_शौर्य ❗

गुरुजी आपको खुब सारी बधाइयां, और मैं तहेदीलसे आपका शुक्रगुजार हूं कि, वोह दीन नजदीक आ रहा है सारी कायनात बुध्दमय हो जायेगी। सादर नमन स्विकार करें गुरुजी।

ऐसा ही एक कार्य मोतीलाल अहिरवार जी का भी है। पुस्तक का नाम सांची गमन या कुछ ऐसा ही है । उसमें भी अशोक के मूल अभिलेखों को पढ़कर शोध किया गया है ।

रोमिला थापर ने भी इस बात का जिक्र किया है कि महाभारत का कैरेक्टर अशोका से प्रेरित है

अशोक स्तम्भ को शिवलिंग बता दिया ये सबसे बड़ा चमत्कार है याने विदेशियो ने हमारा इतिहास बदल दिया!

धरम के नाम शिव-शंकर, लिंग-योनी
पूजन ये अग्यान अर काल दुख गति
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तथाकथित आदिनाथ, आदियोगी, महादेव, शिव, शिव-शंकर, महाकाल, भोलेनाथ, शंकर-पारबति, शिव-लिंग क्या हैं? यह शिव-लिंग पुरुष/शंकर का जननेंद्रिय (penis) और स्त्री/पारबति का जननेंद्रिय (vagina) का आपस में मिला हुआ सांकेतिक धरमनाम पूजन है? क्या उत्पत्ति का मूल है यह? यह योनी-लिंग पूजन ओशो रजनीश के संभोग से समाधि जैसी या उससे भी ज्यादा बात दिखती है। 
जननेंद्रिय पुरुष, स्त्री वा किसी देवता का हो, प्रायवसी की बात है ; दोनों का संभोग और भी प्रायवसी की बात है ; किसी भी तरह से प्रदर्शन वा पूजन की सोभा नहीं, कोई जस्टिफिकेशन नहीं। चाहे कोई इसके साथ और क्या क्या कल्पनाएं जोड दे, तो भी इसमें ध्यान-ग्यान व धरम की सम्यक समझ का सवाल ही नहीं। और यह कब किस प्रोपागंडा से तथाकथित रूप से आदिवासी या मूलनिवासीयों की देवता हुई? कब व कैसे विचार का पैदाइश शिव-शंकर, आदिनाथ, विश्वनाथ, आदियोगी, आदिगुरु यह सिध्दों का भी गुरू, आदिगुरु हो गया? बुद्ध के अवतार होने जैसे प्रोपागंडा से? कोई आदि वा अंतिम योगी, गुरू, नाथ नहीं होत है।  गोरख सीधे कहते हैं :
गुदड़ी जुग जुग तैं आई, 
गुदड़ी सिध साधिकां चलाई।
गुदड़ी मैं अतीत का बासा,
भणंत गोरखनाथ मछिंद्र का दासा।। 
- गोरख।
अत्ता ही अत्तनो नाथो,
अत्ता ही अत्तनो गति ।
अत्ता ही अत्तनो नाथो,
को ही नाथो परो सिया।।    
- भ. बुद्ध । 
मूल अगोचर। — गोरख।

शिव = प्रेम, मंगल, auspicious, love; 
लिंग = संकेत, sign, mark; 
पिंड = a body, mass. 
सो कोई फूल, सादगी से ध्यानी मूर्ति, साफ सुथरा मकान, ताजा पका अन्न, कार्यालय, पेड, पहाड, नदी, तालाब, समाधि पत्थर, मजार, स्तूप, बुद्ध जैसी कोई ध्यानी मूर्ति, सुर्यास्त आदि शिव है, मंगल है, शिव पिंड है, मांगल्य लिंग है । सम्यक ध्यान अर चित्त अवधूनन यह शिव है, मंगल है।
साधू अर सज्जन की कोई जात, गोत, धरमनाम परंपरा नहीं होती। समझ यह स्त्री वा पुरुष नहीं होती। जीवन की उत्पत्ति व गति का मूल स्त्री-पुरुष वा किसी देवी-देवता का संभोग नहीं है। मूल अगोचर! - गोरख ।
सेक्स इंद्रियों का कोई सांकेतिक प्रदर्शन यह शिव लिंग/पिंड नहीं हैं। और ऐसे में कोई कुछ अनुभव करते हैं तो वही अनुभव करते है जिसमें वह विश्वास करते हैं, और कुछ नहीं, और यही उनके अनुभव को अयोग्य सिद्ध करत है। तथा ये ज्योतिर्लिंग, धाम, शक्तिपीठ, तीर्थादि धरम के नाम पर सामंती धंधा केंद्रों से ज्यादा नहीं है। 
काली काल महाकाल यै सब काल,
देखे, भव दुख अग्यान गति काल। 
भ्रमित होना कुदरत को मंजूर नहीं। अंधेरे में भी कांटे पर पांव पडने से कांटा चुभता है। और चेतना मे प्रोपागंडा से धंसे झूठ के कांटे बडा दुख।
कोई खुशामती देवता वा खुदा किसी की चैतसिक दुख निर्जरा नहीं कर सकते। ऐसे में धरमनाम अग्यान व धंधा फैलता है। यह सब समझना काॅमन सेंस की बात हैं। 
अलख संग्यान सूं बोधि धरम जन जन जाने, जीये।
— योगी सूरजनाथ ।

मक्कार "सांस्कृतिक ज्ञान कोश" पर आपकी छापामारी ऐसे ही चलती रहे ! नये तथ्य उजागर होते रहें । शुभकामना ।

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